ममता दीदी ने इस बार विधानसभा चुनाव में एक नारा दिया था - 'खेला होबे' .और अब आये चुनाव के नतीजों ने साफ़ कर दिया है कि आठ चरणों में महीने से ज़्यादा चले चुनावी खेल में टीएमसी की भारी जीत हुई।
और दूसरी तरफ बीजेपी अबकी बार दो सौ पार के नारे के साथ अपनी पूरी ताक़त और संसाधनों के साथ सत्ता हासिल करने के लक्ष्य के साथ मैदान में उतरी अपनी मंज़िल की आधी दूरी भी नहीं तय कर सकी है।
तीसरी बार सत्ता में आने के बाद टीएमसी और उसके समर्थकों में जहां जश्न का माहौल है, वहीं बीजेपी में अब इस हार का ठीकरा केंद्रीय नेतृत्व पर फोड़ा जाने लगा है।
इस साल की शुरुआत में जिस आक्रामक तरीक़े से बीजेपी ने टीएमसी सरकार पर हमले के साथ बड़े पैमाने पर चुनाव अभियान छेड़ा था। पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हलक़ों में भी बीजेपी के सत्ता में आने या टीएमसी को कांटे की टक्कर देने जैसी संभावनाएं जताई जाने लगी थीं।
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| Image by-Narendra modi/facebook |
प्रधानमंत्री मोदी के 'आशोल परिवर्तन' का वादा
कई राजनीतिक विशेषज्ञ तो बीजेपी के 'आशोल परिवर्तन' के नारे के सच होने की भी भविष्यवाणी करने लगे थे. लेकिन आज के नतीजों ने साफ़ कर दिया है कि बीजेपी के हिंदुत्ववाद पर ममता के बांग्ला का उप-राष्ट्रवाद भारी रहा है।
लगभग तीन महीनो से पूरी केंद्र सरकार और तमाम मंत्री और नेता, कई राज्यों के मुख्यमंत्री बंगाल चुनाव प्रचार में लगातार जुटे रहे. चुनाव प्रचार के दौरान शायद ही ऐसा कोई दिन बीता हो जब कोई केंद्रीय मंत्री या नेता यहां रोड शो या रैली नहीं कर रहा हो।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद ने क़रीब डेढ़ दर्जन रैलियां की थी. और गृह मंत्री अमित शाह और दूसरे नेताओं की रोड शो और रैलियों की लिस्ट तो काफ़ी लंबी है।
बीजेपी ने अपने पूरे संसाधनों के ज़रिए चुनाव अभियान में एक समय के लिए यह माहौल बनाने में कामयाब रही कि वह हर सीट पर टीएमसी को कांटे की टक्कर देगी. लेकिन चुनावी नतीजों ने बीजेपी को करारा झटका दिया है।
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| Image source-facebook |
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की जीत का कारण
बीजेपी ममता दीदी के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण जैसे आरोप तो बहुत पहले से लगा रही थीं. साथ ही बीजेपी ने जातिगत पहचान का मुद्दा भी बड़े पैमाने पर उठाया था.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मतुआ वोटरों को लुभाने के लिए अपनी बांग्लादेश यात्रा के दौरान मतुआ धर्मगुरू हरिचांद ठाकुर के जन्मस्थान पर बने मंदिर में गए थे और वहां से लौट कर मतुआ-बहुल ठाकुरनगर में रैली भी की थी
और गृह मंत्री अमित शाह ने CAA के ज़रिए मतुआ समुदाय के लोगों को नागरिकता देने का वादा किया था.।
बीजेपी के हिंदुत्ववाद के सामने चुनावी मंच से ममता बनर्जी ने चंडीपाठ तो किया और ख़ुद को ब्राह्मण की बेटी भी बताया इससे ममता को अल्पसंख्यकों का तो भरपूर समर्थन मिला ही,साथ हिंदू वोटरों के बड़े तबक़े ने भी टीएमसी का समर्थन किया।इसके अलावा ममता के पैर में लगी चोट और उनके व्हीलचेयर पर रह कर पूरा चुनाव अभियाना चलाना भी उनके पक्ष में रहा।
इस चुनाव में कांग्रेस और लेफ्ट वाले संयुक्त मोर्चा की दुर्गति की वजह से इन दोनों दलों के वोटों का बड़ा हिस्सा भी टीएमसी को मिला।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की उम्मीद
बीजेपी को कांग्रेस का गढ़ मुर्शिदाबाद और मालदा में जैसी कामयाबी मिली है उससे यह बात साफ़ हो जाती है. की बीजेपी को उम्मीद थी कि फुरफुरा शरीफ़ वाली पार्टी इंडियन सेक्यूलर फ्रंट शायद अल्पसंख्यक वोट बैंक में सेंध लगाएगी.
लेकिन न तो वह कोई छाप छोड़ सकी और न ही असदउद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम. ममता ने बीजेपी का मज़बूत गढ़ समझे जाने वाले जंगलमहल इलाक़े में भी ख़ासी सेंध लगाई है
सुबह नतीजे आने से पहले प्रदेश बीजेपी के दफ्तर में भारी भीड़ थी और जश्न जैसा माहौल था. शुरुआती रुझानों में टीएमसी को बढ़त के बावजूद कैलाश विजयवर्गीय का दावा था, 'असली नतीजे आने दीजिए. हम सरकार बनाने जा रहे हैं.'
लेकिन दिन चढ़ने के साथ टीएमसी के साथ सीटों का फ़ासला बढ़ने के साथ ही मुख्यालय के बाहर सन्नाटा छाने लगा था. जबकि दूसरी ओर कालीघाट स्थित ममता बनर्जी के आवास पर सुबह से ही समर्थकों की भीड़ लगातार बढ़ने लगी थी और जश्न का माहौल था।




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